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शहद से बनेगी खास ड्रिंक, PAU ने तैयार किया कमाई का नया फॉर्मूला; मधुमक्खी पालकों की चमकेगी किस्मत

लुधियाना: पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू), लुधियाना ने मधुमक्खी पालन क्षेत्र को नई दिशा देने के लिए एक क्रांतिकारी तकनीक विकसित की है। वैज्ञानिकों ने अतिरिक्त और गैर-मानक शहद से ‘मीड’ (Mead) नामक विशेष एल्कोहलिक बेवरेज तैयार करने की मानकीकृत विधि ईजाद की है। शहद, पानी और चुनिंदा यीस्ट कल्चर के किण्वन (फर्मेंटेशन) से बनने वाला मीड मानव इतिहास के सबसे प्राचीन पेयों में शुमार है। पीएयू के इस वैज्ञानिक नवाचार के जरिए अब मधुमक्खी पालक अपने अतिरिक्त और कम गुणवत्ता वाले शहद को औने-पौने दामों में बेचने या बर्बाद होने से बचाकर एक प्रीमियम क्राफ्ट ड्रिंक में तब्दील कर सकेंगे।

खराब होने वाले कच्चे शहद से अब होगा बंपर मुनाफा

भारत दुनिया का छठा सबसे बड़ा शहद उत्पादक देश है और वैश्विक उत्पादन में करीब 3.5 फीसदी हिस्सेदारी रखता है। इसके बावजूद वातावरण से नमी सोखने के गुण के कारण कच्चा शहद अक्सर अशुद्धियों और भंडारण के दौरान खराब होने की समस्या से जूझता है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। पीएयू की नई तकनीक इस समस्या का स्थायी समाधान साबित हो रही है। यह तकनीक अनुपयोगी माने जाने वाले शहद को बायोएक्टिव तत्वों, एंटीऑक्सीडेंट्स और आवश्यक खनिजों से भरपूर एक उच्च गुणवत्ता वाले फंक्शनल एल्कोहलिक ड्रिंक में बदलकर उत्पादकों को आर्थिक संबल देगी।

मात्र 8 से 9 दिनों में तैयार, अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुकूल

व्यावसायिक मीड में आमतौर पर 8 से 14 प्रतिशत तक एथेनॉल की मात्रा होती है, जिसे उपभोक्ताओं की पसंद के आधार पर ड्राई, सेमी-स्वीट और स्वीट वेरियंट में पेश किया जा सकता है। इसे तैयार करने की वैज्ञानिक प्रक्रिया तीन चरणों में पूरी होती है, जिसमें पहले अशुद्धियों को दूर करने के लिए कच्चे शहद का प्री-ट्रीटमेंट होता है, फिर नियंत्रित एथेनॉलिक फर्मेंटेशन किया जाता है और अंत में क्लैरिफिकेशन व मैच्योरिटी की प्रक्रिया अपनाई जाती है। फर्मेंटेशन शुरू होने के महज 8 से 9 दिनों के भीतर ही इसमें लगभग 8.6 प्रतिशत एथेनॉल स्तर हासिल हो जाता है, जिसे बाद में परिपक्व कर इसका स्वाद और स्थिरता बढ़ाई जाती है।

ग्रामीण युवाओं और एग्री-स्टार्टअप्स के लिए खुलेंगे नए रास्ते

पीएयू के माइक्रोबायोलॉजी विभाग की एक्सटेंशन साइंटिस्ट डॉ. केशानी और प्रिंसिपल माइक्रोबायोलॉजिस्ट डॉ. गुरविंदर सिंह कोचर के अनुसार, बाजार में कच्चे शहद के घटते-बढ़ते दामों के बीच यह तकनीक मधुमक्खी पालकों की आय को स्थिरता प्रदान करेगी। क्राफ्ट बेवरेज के बढ़ते बाजार को देखते हुए पंजाब इस उद्योग में देश का नेतृत्व करने की मजबूत स्थिति में आ गया है। विश्वविद्यालय के अनुसंधान निदेशालय द्वारा इस तकनीक के व्यवसायीकरण से न केवल उत्पाद विविधीकरण को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि आधारित नए उद्यम और स्वरोजगार के बेहतरीन अवसर भी पैदा होंगे।

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