लुधियाना: जालंधर बाईपास स्थित नारायणा स्कूल में पढ़ाई में कमजोर बताकर एक छात्रा को 10वीं कक्षा में बैठने से रोकने के मामले में स्कूल प्रबंधन को कोर्ट के सख्त आदेश के आगे झुकना पड़ा है। लोक अदालत के कड़े रुख और स्पष्ट निर्देशों के बाद आखिरकार स्कूल प्रशासन ने छात्रा को 10वीं कक्षा में री-एडमिशन देकर कक्षा में प्रवेश की अनुमति दी।
स्कूल ने दी थी दो शर्तें: या तो स्कूल छोड़ें या 9वीं दोबारा पढ़ें
पीड़ित छात्रा के परिजनों के अनुसार, स्कूल प्रबंधन ने छात्रा को 10वीं की पढ़ाई में कमजोर बताते हुए उस पर दबाव बनाया था। प्रबंधन ने शर्त रखी थी कि या तो छात्रा को स्कूल से हटा लिया जाए या फिर उसे 9वीं कक्षा दोबारा रिपीट कराई जाए। जब परिजन इस अनुचित दबाव के आगे नहीं झुके और उन्होंने इसका विरोध किया, तो स्कूल प्रशासन ने छात्रा को 10वीं की कक्षा में बैठने से रोक दिया।
लोक अदालत पहुंचे पिता, कोर्ट ने कहा- ‘पढ़ने से नहीं रोका जा सकता’
स्कूल के इस मनमाने रवैये के खिलाफ छात्रा के पिता बलकार सिंह ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। मामले की सुनवाई करते हुए लोक अदालत ने छात्रा के पक्ष में कड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने स्कूल प्रबंधन को निर्देशित किया कि छात्रा को तुरंत 10वीं कक्षा में री-एडमिशन दिया जाए और साफ किया कि किसी भी बच्चे को पढ़ाई करने के मौलिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
आदेश लेकर पहुंचे तो पहले किया इनकार, 2 घंटे ड्रामे के बाद मिली एंट्री
छात्रा के पिता ने आरोप लगाया कि जब वे सुबह लोक अदालत के आदेश की कॉपी लेकर स्कूल पहुंचे, तो प्रबंधन ने शुरुआत में आदेश मानने से इनकार कर दिया। स्कूल प्रिंसिपल ने यह कहते हुए टालमटोल की कि पहले उनकी लीगल टीम इन आदेशों की समीक्षा करेगी। हालांकि, परिजनों के कड़े रुख और कानूनी पेच में फंसने के डर से करीब दो घंटे चले ड्रामे के बाद प्रबंधन को पीछे हटना पड़ा और छात्रा को क्लास में एंट्री दे दी गई।


School management yields to court order after attempting to expel a female student on the grounds




