लुधियाना: पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) के वैज्ञानिकों ने किसानों के लिए सिरदर्द बने चूहों की बढ़ती आबादी पर काबू पाने के लिए एक क्रांतिकारी और ‘इको-फ्रेंडली’ समाधान खोज निकाला है। फसलों को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाने वाले चूहों को मारने के बजाय उनकी प्रजनन क्षमता को रोकने के लिए वैज्ञानिकों ने एक विशेष ‘गर्भनिरोधक चारा’ तैयार किया है। इस बड़ी उपलब्धि के लिए यूनिवर्सिटी को आधिकारिक तौर पर पेटेंट भी प्राप्त हो गया है।
यह पेटेंट यूनिवर्सिटी की प्रिंसिपल जूलॉजिस्ट डॉ. नीना सिंगला, रिसर्च को-ऑर्डिनेटर डिंपल मंडला और डॉ. अनु कालिया के नाम दर्ज किया गया है। वैज्ञानिकों ने इसे ‘रेडी-टू-यूज फूड’ यानी सीधे इस्तेमाल किए जाने वाले चारे के रूप में तैयार किया है। डॉ. नीना सिंगला के अनुसार, इस चारे का असर लंबे समय तक रहता है और यह पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक अहम कदम है। इस चारे को खाने के बाद चूहों की प्रजनन प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है, जिससे वे सामान्य की तुलना में कम बच्चे पैदा करते हैं और उनकी आबादी नियंत्रित रहती है।
इस आविष्कार की सबसे बड़ी खासियत यह है कि चूहों की प्रजनन क्षमता को रोकने के लिए पहली बार नैनोपार्टिकल लेयर में ‘कुइनेस्ट्रोल’ (Quinestrol) नामक दवा का इस्तेमाल किया गया है। नैनोपार्टिकल आधारित यह फॉर्मूलेशन सिंथेटिक गर्भनिरोधक कंपाउंड की जरूरी मात्रा (डोज) को काफी कम कर देता है। इससे न केवल पर्यावरण में प्रदूषण कम होता है, बल्कि चूहों के अलावा अन्य जीवों (नॉन-टार्गेट) की सुरक्षा भी सुनिश्चित होती है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी तक चूहों को मारने के लिए पारंपरिक तरीकों या जहरीली दवाओं का इस्तेमाल होता था, जिससे कुछ चूहे तो मर जाते थे, लेकिन उनकी आबादी बढ़ने की रफ्तार नहीं रुकती थी। इसके विपरीत, यह नया चारा एक मानवीय, कुशल और टिकाऊ विकल्प है। यह बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए उपयुक्त है और इसे खेती के इको-सिस्टम के साथ-साथ शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में भी आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है। इस पेटेंटेड तकनीक के बाज़ार में आने और व्यावसायीकरण की संभावनाएं भी काफी प्रबल हैं।

Relief from the menace of rats is on the way; scientists have developed an eco-friendly bait to control their population




