वृंदावन: आज के कलयुगी दौर में जब भी कोई व्यक्ति दुखों से घिरता है या समाज में बुराई को फलते-फूलते देखता है, तो उसके मन में एक सवाल जरूर उठता है। सवाल यह है कि अगर भगवान सब देख रहे हैं और हम उन्हीं के बच्चे हैं, तो वह हमें गलत काम करने से रोकते क्यों नहीं? अध्यात्म की अलख जगाने वाले और सोशल मीडिया पर अपनी सीख के लिए मशहूर प्रेमानंद महाराज से हाल ही में एक भक्त ने यही यक्ष प्रश्न पूछ लिया। महाराज जी ने इसका जो जवाब दिया, वह न केवल तार्किक है बल्कि जीवन की दिशा बदल देने वाला है।
भक्त ने पूछा सीधा सवाल
सत्संग के दौरान एक जिज्ञासु भक्त ने अपनी दुविधा रखते हुए महाराज जी से पूछा, “महाराज जी, आप कहते हैं कि हम परमात्मा के अंश हैं और वे हमारे परमपिता हैं। फिर उन्होंने हमें गलत काम करने का बल और बुद्धि क्यों दी? जब वे जानते हैं कि उनका बच्चा गलत राह पर जा रहा है, तो वे हाथ पकड़कर हमें रोक क्यों नहीं लेते? आखिर पिता तो अपने बच्चे को कभी खाई में गिरने नहीं देता।”
100 रुपये का उदाहरण देकर समझाया गणित
भक्त की इस जिज्ञासा को शांत करते हुए प्रेमानंद महाराज ने बहुत ही सरल उदाहरण दिया। उन्होंने कहा, “मान लीजिए किसी ने आपको 100 रुपये दिए और बाजार भेज दिया। अब यह पूरी तरह से आप पर निर्भर करता है कि आप उस पैसे से फल और मिठाई खरीदकर अपना पेट भरते हैं, या उसे जुए और शराब जैसे बुरे कामों में उड़ा देते हैं। देने वाले ने तो आपको केवल एक ‘साधन’ (पूंजी) दिया है, उसका इस्तेमाल कैसे करना है, यह आपका निजी चुनाव है। ठीक इसी तरह ईश्वर ने हमें जीवन रूपी पूंजी दी है।”
विवेक ही है असली मार्गदर्शक
प्रेमानंद महाराज ने आगे समझाया कि भगवान ने मनुष्य को हाथ, पैर, वाणी और सबसे बढ़कर ‘विवेक’ (सोचने-समझने की शक्ति) दी है। यह एक ईश्वरीय पूंजी है। आपको बोलने की शक्ति मिली है, अब यह आप पर है कि आप उस मुख से किसी को गाली देते हैं या ‘राधा-राधा’ और ‘राम-राम’ का जाप करते हैं। भगवान ने आंखें दी हैं, तो आप उससे अश्लीलता देख सकते हैं या प्रभु के दर्शन कर सकते हैं। हाथ दिए हैं, तो आप किसी की मदद कर सकते हैं या किसी का अहित। चुनाव आपका ही होगा।
हमें रोबोट नहीं, स्वतंत्र जीव बनाया है
महाराज जी के अनुसार, मनुष्य जन्म हमें अपनी पुरानी गलतियों और बुरी आदतों को सुधारने के लिए मिला है। भगवान ने हमें ‘कर्म की स्वतंत्रता’ दी है। अगर भगवान हमें रोबोट की तरह कंट्रोल करते, तो फिर पाप और पुण्य का कोई महत्व ही नहीं रह जाता। ईश्वर ने हमें बुद्धि दी है जो हर गलत काम करने से पहले हमें अंदर से टोकती है। जिसे हम ‘अंतरात्मा की आवाज’ कहते हैं, वही भगवान का हमें रोकने का तरीका है। लेकिन अगर हम उस आवाज को अनसुना कर देते हैं, तो यह हमारी इच्छाशक्ति की कमी है। भगवान रास्ता दिखाते हैं, लेकिन उस रास्ते पर चलना या न चलना पूरी तरह मनुष्य के हाथ में है।





