जालंधर: अपने ही शहर की एक पुरानी और जर्जर इमारत में बरसों से धूल फांक रही एक लोहे की मशीन रातों-रात करोड़ों का खजाना साबित होगी, यह किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था। जिस चीज को लोग अब तक महज एक कबाड़ समझकर नजरअंदाज कर रहे थे, वह असल में विंटेज इंजीनियरिंग का एक बेहद नायाब और बेशकीमती नमूना निकली। साल 1921 में जर्मनी की तकनीक से तैयार हुआ यह ऐतिहासिक ट्रैक्टर अब 1.25 करोड़ रुपये की भारी-भरकम कीमत चुकाकर खरीदा गया है और जल्द ही यह सात समंदर पार अमेरिका के एक प्रतिष्ठित म्यूजियम की शोभा बढ़ाता हुआ नजर आएगा।
भगत सिंह चौक के पास छिपा था यह विंटेज खजाना
शहर के व्यस्ततम इलाकों में शुमार भगत सिंह चौक के करीब स्थित एक खंडहरनुमा इमारत में यह ट्रैक्टर सालों से लावारिस हालत में खड़ा था। पुनीत वडेरा के मुताबिक, यह कोई आम कृषि यंत्र नहीं था, बल्कि जर्मनी में बना लंज बुलडॉग एचएल-12 मॉडल था। आसपास रहने वाले स्थानीय निवासियों को इस बात का जरा सा भी इल्म नहीं था कि पुरानी और विंटेज गाड़ियों के अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस धूल खाती मशीन की कीमत और अहमियत कितनी ज्यादा है।
लाखों से शुरू हुई बोली ने पार किया करोड़ों का आंकड़ा
इस दुर्लभ मशीन की भनक लगते ही इसे खरीदने के लिए होड़ मच गई। सबसे पहले मुंबई की एक कंपनी ने इसके लिए महज दो लाख रुपये का प्रस्ताव रखा था। जैसे-जैसे इसकी अहमियत का पता चला, वैसे-वैसे इसकी बोली भी तेजी से बढ़ने लगी और देखते ही देखते 28 लाख रुपये तक पहुंच गई। हालांकि, मालिक ने इन सभी शुरुआती प्रस्तावों को ठुकरा दिया। आखिरकार इस मशीन की ऐतिहासिक और तकनीकी महत्ता को समझते हुए एक विदेशी कंपनी ने सवा करोड़ रुपये की शानदार डील के साथ इसे अपना बना लिया।
विशेष सुरक्षा के साथ ट्रक से किया गया रवाना
करोड़ों रुपये की यह ऐतिहासिक डील पूरी होने के बाद, बीते दिन इस बेशकीमती ट्रैक्टर को बेहद खास सावधानी और सुरक्षा के बीच एक बड़े ट्रक में लोड किया गया। अब 105 साल पुरानी यह ऐतिहासिक मशीन भारत की सरजमीं से विदा लेकर सीधे कैलिफोर्निया (यूएसए) के एक मशहूर म्यूजियम में प्रदर्शनी के लिए रखी जाएगी, जहां दुनिया भर से आने वाले विंटेज प्रेमी इसका दीदार कर सकेंगे।
बेहद अनोखी तकनीक से लैस था यह लंज बुलडॉग
लंज बुलडॉग एचएल-12 मॉडल अपनी कार्यप्रणाली और इंजीनियरिंग के लिए उस दौर में काफी मशहूर था। इस ट्रैक्टर में सिंगल सिलेंडर ‘हॉट-बल्ब’ इंजन लगा हुआ था, जिसे चालू करने का तरीका भी काफी दिलचस्प था। इसे स्टार्ट करने से पहले इसके इंजन को बाहर से काफी देर तक गर्म करना पड़ता था। इस मशीन की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि एक बार इंजन चालू होने के बाद यह बेहद कम गति पर भी बेहिसाब ताकत और टॉर्क पैदा करने में सक्षम थी।
खेतों से लेकर अनाज पीसने तक में होता था इस्तेमाल
अपने निर्माण के समय में इस ताकतवर ट्रैक्टर का इस्तेमाल केवल खेतों की जुताई तक ही सीमित नहीं रहता था। खेती-बाड़ी के अलावा इसका उपयोग पानी के भारी-भरकम पंप चलाने और अनाज पीसने वाली बड़ी चक्कियों को ऊर्जा देने जैसे कई अन्य महत्वपूर्ण कार्यों के लिए भी व्यापक स्तर पर किया जाता था। अपनी इन्हीं खासियतों और बहुमुखी उपयोगिता के कारण आज यह विंटेज तकनीक की दुनिया में एक दुर्लभ और अमूल्य धरोहर माना जाता है।

Jalandhar’s ruins have yielded a treasure worth ₹1.25 crore. A 105-year-old tractor found in the junkyard




