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फिल्म ‘सतलुज’ विवाद के बीच फिर गरमाया 1995 का हाई-प्रोफाइल हत्याकांड, जमानत पर बाहर हत्यारे पूर्व DSP को ढूंढने के निर्देश जारी

होशियारपुर: फिल्म ‘सतलुज’ को लेकर चल रहे भारी विवाद के बीच देश के सबसे चर्चित और हाई-प्रोफाइल मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के कत्ल का मामला एक बार फिर से सुर्खियों में आ गया है। इस हत्याकांड में उम्रकैद की सजा काट रहे दोषी पूर्व डीएसपी (DSP) जसपाल सिंह की तलाश अचानक तेज हो गई है। नाभा ओपन एग्रीकल्चर जेल प्रशासन ने होशियारपुर पुलिस को एक पत्र लिखकर पूर्व डीएसपी का अता-पता लगाने के सख्त निर्देश दिए हैं। होशियारपुर के थाना सदर ने इस बात की आधिकारिक पुष्टि कर दी है कि उन्हें जेल प्रशासन की तरफ से पूर्व डीएसपी को ढूंढने और उसकी स्थिति स्पष्ट करने के लिए कहा गया है।

मई 2023 से जमानत पर बाहर हैं पूर्व डीएसपी जसपाल सिंह
जसवंत सिंह खालड़ा हत्याकांड में उम्रकैद की सजा काट रहे पूर्व डीएसपी जसपाल सिंह को मई 2023 में नाभा ओपन एग्रीकल्चर जेल से 1 लाख रुपये के निजी बॉन्ड पर जमानत पर रिहा किया गया था। दरअसल, सितंबर 2022 में तत्कालीन पंजाब सरकार ने जसपाल सिंह की समय से पहले सजा माफी का प्रस्ताव राज्यपाल के पास भेजा था। सरकार का यह प्रस्ताव अभी भी राज्यपाल के पास पेंडिंग पड़ा हुआ है और इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं आया है। इसी को देखते हुए एग्रीकल्चर जेल नाभा के प्रशासन ने अब होशियारपुर पुलिस को पत्र भेजकर जल्दी से जल्दी पूर्व डीएसपी का पता लगाने और रिपोर्ट सौंपने को कहा है।

हाई कोर्ट के इस खास नियम के तहत मिली थी जमानत
एक सीनियर जेल अधिकारी की तरफ से दी गई जानकारी के मुताबिक, राज्य सरकार के प्रस्ताव पर राज्यपाल की तरफ से लंबे समय तक कोई फैसला नहीं लिया गया था। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के एक पुराने आदेश (COCP नंबर 2020/2022) में यह स्पष्ट प्रावधान है कि यदि सरकार के सजा माफी के प्रस्ताव पर राज्यपाल 3 महीने के भीतर कोई फैसला नहीं लेते हैं, तो इस याचिका पर अंतिम फैसला आने तक कैदी को जमानत पर रिहा किया जा सकता है। हाई कोर्ट के इसी नियम को आधार बनाते हुए पटियाला की सीजेएम (CJM) नवदीप कौर गिल ने पूर्व डीएसपी जसपाल सिंह को जमानत पर रिहा करने के आदेश जारी किए थे।

2019 में तत्कालीन राज्यपाल ने खारिज कर दी थी माफी की अर्जी
जसपाल सिंह के कानूनी सफर पर नजर डालें तो इससे पहले भी उसे हाई कोर्ट से पैरोल मिली थी, लेकिन टांडा के एक अन्य मामले (FIR 81/1996) में 5 साल की सजा होने के चलते जेल प्रशासन ने उसे रिहा नहीं किया था। इसके खिलाफ उसने हाई कोर्ट में ‘हेबियस कॉर्पस’ याचिका लगाई थी, जिसे उसने बाद में वापस ले लिया। साल 2019 में तत्कालीन राज्यपाल वी.पी. सिंह बदनौर ने केंद्रीय गृह मंत्रालय की कड़ी आपत्ति के बाद जसपाल सिंह की सजा माफी की अर्जी को सिरे से खारिज कर दिया था, जिसके बाद उसकी उम्रकैद की सजा दोबारा शुरू हो गई थी। कोरोना महामारी के दौरान उसे फिर से पैरोल मिली थी। साल 2021 में उसने दोबारा हाई कोर्ट में अपील की, लेकिन अगस्त 2022 में अपना केस वापस ले लिया, जिसके बाद कोर्ट ने उसे 16 अगस्त 2022 तक सरेंडर करने का आदेश दिया था। बता दें कि जसपाल सिंह ने अपनी सजा का एक बड़ा हिस्सा ओपन जेल में ही काटा है।

क्या था 1995 का जसवंत सिंह खालड़ा हत्याकांड?
साल 1995 में पंजाब के प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा को संदिग्ध परिस्थितियों में अगवा कर उनकी हत्या कर दी गई थी। इस हाई-प्रोफाइल और संवेदनशील मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई थी। साल 2005 में पटियाला की विशेष सीबीआई (CBI) अदालत ने इस मामले में तत्कालीन डीएसपी जसपाल सिंह और एएसआई अमरजीत सिंह को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जबकि चार अन्य पुलिसकर्मियों को 7-7 साल की सजा दी गई थी। बाद में जब यह मामला हाई कोर्ट पहुंचा, तो सुनवाई के दौरान अदालत ने एएसआई अमरजीत सिंह को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया, जबकि बाकी चारों पुलिसकर्मियों (सुरिंदरपाल सिंह, जसबीर सिंह, सतनाम सिंह और पृथ्वीपाल सिंह) की 7 साल की सजा को बढ़ाकर उम्रकैद में तब्दील कर दिया था।

Amid the controversy surrounding the film ‘Satluj’, the 1995 high-profile murder case has resurfaced