नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम और ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि अगर कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को छोड़कर कोई अन्य धर्म अपना लेता है, तो उसे अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा नहीं मिल सकता। शीर्ष अदालत ने साफ कहा है कि धर्म परिवर्तन के साथ ही व्यक्ति का अनुसूचित जाति का दर्जा स्वतः ही समाप्त हो जाता है। ऐसे में उस व्यक्ति को एससी/एसटी (SC/ST) अत्याचार निवारण कानून के तहत मिलने वाला संरक्षण भी नहीं मिलेगा। कोर्ट ने विशेष रूप से यह टिप्पणी की है कि ईसाई या मुस्लिम धर्म अपनाने वाले व्यक्ति को इस एक्ट का लाभ किसी भी सूरत में नहीं दिया जा सकता।
क्या है पूरा मामला और कैसे शुरू हुआ विवाद?
यह पूरा मामला आंध्र प्रदेश से जुड़ा है। यहां रहने वाले चिंथाडा आनंद नाम के एक पादरी ने एससी/एसटी एक्ट के तहत एक केस दर्ज कराया था। अपनी शिकायत में उन्होंने आरोप लगाया था कि कुछ लोगों ने उन्हें जातिसूचक गालियां दीं, उनके साथ मारपीट की और जान से मारने की धमकी भी दी। वहीं, दूसरी तरफ आरोपी पक्ष की दलील थी कि आनंद ने ईसाई धर्म अपना लिया है और वह बकायदा एक पादरी बन चुके हैं, इसलिए उन्हें अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा और इस कानून का संरक्षण नहीं मिल सकता।
हाईकोर्ट ने आरोपी की दलील मानकर रद्द कर दी थी FIR
इस मामले में सबसे पहले आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाया था। हाईकोर्ट ने आरोपी पक्ष की दलील को बिल्कुल सही माना और पादरी की तरफ से दर्ज कराई गई एफआईआर को ही रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट का स्पष्ट कहना था कि जो व्यक्ति ईसाई धर्म अपना चुका है और सक्रिय रूप से उसी धर्म का पालन कर रहा है, उसका अनुसूचित जाति का दर्जा बरकरार नहीं रह सकता। अदालत ने यह भी साफ किया था कि भले ही उस व्यक्ति के पास पुराना एससी प्रमाणपत्र मौजूद हो, लेकिन धर्म बदलने के बाद वह अमान्य हो जाता है।
पादरी ने खटखटाया सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के इसी फैसले से असंतुष्ट होकर आनंद ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति पी.के. मिश्रा और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने की। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर लगाते हुए उसे पूरी तरह से सही ठहराया। शीर्ष अदालत ने माना कि जो व्यक्ति ईसाई धर्म का अनुयायी बन गया है और उसकी मान्यताओं का सक्रिय रूप से पालन कर रहा है, उसे कानूनन अनुसूचित जाति समुदाय के सदस्य के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती है।
दशकों से प्रार्थना सभा चला रहे थे पादरी, स्वतः खत्म हुआ दर्जा
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कई अहम तथ्यों पर गौर किया। कोर्ट ने पाया कि आनंद पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से रविवार की प्रार्थनाएं आयोजित कर रहे थे और जिस वक्त यह कथित घटना हुई, उस समय भी वह ईसाई धर्म का ही पालन कर रहे थे। अदालत ने कहा कि इन तथ्यों से साबित होता है कि उनका एससी दर्जा स्वतः ही खत्म हो गया था। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि याचिकाकर्ता ने कहीं भी यह दावा नहीं किया है कि उसने वापस अपने मूल धर्म में वापसी कर ली है या उसे मादिगा समुदाय में दोबारा स्वीकार कर लिया गया है।
घटना के वक्त अनुसूचित जाति का हिस्सा नहीं थे पीड़ित
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले को विस्तार देते हुए कहा कि घटना वाले दिन भी याचिकाकर्ता प्रार्थना सभा चला रहा था। अदालत ने कहा कि इन सभी बातों से यह बात बिना किसी संदेह के साबित हो जाती है कि घटना के दिन वह पूरी तरह से ईसाई धर्म का अनुयायी था। इसलिए, उस तारीख पर वह कानूनी तौर पर अनुसूचित जाति का हिस्सा नहीं था और इसी वजह से उसे एससी/एसटी एक्ट का लाभ नहीं दिया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला अब उन सभी मामलों के लिए एक नजीर बनेगा, जहां किसी अनुसूचित जाति के व्यक्ति ने हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को छोड़कर ईसाई या कोई अन्य धर्म अपना लिया है।

they will not be entitled to the benefits of the SC/ST Act following religious conversion—a major ruling by the Supreme Court.




