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आय से अधिक संपत्ति में बिक्रम मजीठिया को सुप्रीम कोर्ट से मिली जमानत, 9 महीने बाद नाभा जेल से आएंगे बाहर

चंडीगढ़: पंजाब की राजनीति में एक बड़े घटनाक्रम के तहत शिरोमणि अकाली दल के कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के मामले में देश की सर्वोच्च अदालत ने उन्हें जमानत दे दी है। पार्टी के प्रवक्ता अर्शदीप सिंह कलेर ने मजीठिया को बेल मिलने की पुष्टि की है। मजीठिया पिछले करीब 9 महीने से जेल की सलाखों के पीछे हैं और इस फैसले के बाद उनके जल्द बाहर आने का रास्ता साफ हो गया है।

जून में 25 ठिकानों पर छापेमारी के बाद हुई थी गिरफ्तारी

तीन बार विधायक रह चुके मजीठिया की मुश्किलें तब बढ़ी थीं, जब 25 जून को विजिलेंस ब्यूरो ने उनके अमृतसर स्थित निजी आवास समेत 25 अलग-अलग ठिकानों पर तड़के छापेमारी की थी। इस रेड के दौरान विजिलेंस ने कई डिजिटल उपकरण, प्रॉपर्टी के दस्तावेज और वित्तीय रिकॉर्ड जब्त किए थे। गिरफ्तारी के बाद 26 जून को मोहाली कोर्ट ने उन्हें पहले 7 दिन और बाद में 4 दिन की पुलिस रिमांड पर भेजा था। रिमांड खत्म होने के बाद 6 जुलाई को उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था। तब से वे नाभा जेल में बंद हैं। इस दौरान रक्षा बंधन, दशहरा और दिवाली जैसे प्रमुख त्योहार उन्हें जेल में ही बिताने पड़े।

40 हजार पन्नों की चार्जशीट और 200 गवाह

विजिलेंस ब्यूरो ने मजीठिया के खिलाफ अपना केस मजबूत करने के लिए 22 अगस्त को अदालत में एक विशाल चार्जशीट दाखिल की थी। यह चार्जशीट 40,000 से भी अधिक पन्नों की है, जिसमें 200 से ज्यादा गवाहों के बयान और दस्तावेजी सबूत शामिल हैं। जांच एजेंसी का पूरा जोर यह साबित करने पर था कि मजीठिया ने अपनी आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति जमा की है।

भोला ड्रग रैकेट से जुड़े थे तार

इस पूरे मामले की जड़ें साल 2013 के चर्चित 6,000 करोड़ रुपये के सिंथेटिक ड्रग रैकेट से जुड़ी हैं। उस समय ईडी की जांच में बर्खास्त डीएसपी जगदीश सिंह भोला ने पूछताछ के दौरान मजीठिया का नाम लिया था, जिसने पंजाब की राजनीति में भूचाल ला दिया था। हालांकि, बाद में अदालतों ने ड्रग तस्करी से जुड़े सीधे आरोपों को खारिज कर दिया था, लेकिन मौजूदा मामला उसी जांच से निकले भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग (धन शोधन) के आरोपों पर केंद्रित है।

Bikram Majithia granted bail by the Supreme Court in disproportionate assets case