
लंदन: अमेरिका के बाद अब यूनाइटेड किंगडम (यूके) में भी भारतीय छात्रों पर सख्ती बढ़ा दी गई है। कीर स्टारमर की नई सरकार ने विदेशी छात्रों के वीज़ा की रैंडम (औचक) जांच करने के नए आदेश जारी किए हैं। यह कड़ा कदम कई छात्रों के गैरकानूनी तरीके से वर्कप्लेस पर तय समय से ज्यादा काम करने के मामले सामने आने के बाद उठाया गया है।
इस फैसले से यूके में पढ़ रहे लगभग 98 हजार भारतीय छात्र सीधे तौर पर इमिग्रेशन एजेंसियों के रडार पर आ गए हैं। अब छात्रों से कहीं भी, चाहे वह कॉलेज हो या वर्कप्लेस, उनके वीज़ा के बारे में जांच की जा सकेगी। सरकार ने ओवर स्टे (वीज़ा अवधि समाप्त होने के बाद भी रुकने) के दोषी पाए गए छात्रों और अन्य वीज़ा धारकों को डिपोर्ट (निष्कासित) करना भी शुरू कर दिया है।
यूके के नियमों के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय छात्र पढ़ाई के दिनों में (जब कॉलेज और यूनिवर्सिटी चल रही हों) हफ्ते में केवल 20 घंटे और छुट्टियों के दौरान हफ्ते में 40 घंटे तक ही कानूनी तौर पर काम कर सकते हैं।
हालांकि, जांच में यह बात सामने आई है कि बड़ी संख्या में अंतरराष्ट्रीय छात्र कॉलेज के दिनों और छुट्टियों में भी तयशुदा समय से कहीं ज्यादा काम कर रहे हैं, जो यूके के वर्क नियमों का सीधा उल्लंघन है।

इस धांधली को रोकने के लिए स्टारमर सरकार ने अमेरिकी ‘ICE’ (इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट) टीम की तर्ज पर स्पेशल इमिग्रेशन टीमों का गठन किया है। सूत्रों के अनुसार, हर पुलिस थाने में बनाई गई ये टीमें कॉलेजों और वर्क प्लेस पर रैंडम जांच कर रही हैं। इन टीमों की कार्रवाई से छात्रों में दहशत का माहौल है और वे अपने साथ हर समय वीज़ा, पासपोर्ट और अन्य जरूरी दस्तावेज रखने को मजबूर हो गए हैं। पुलिस ने अवैध प्रवासियों की धरपकड़ के लिए मुखबिरों की टीम भी बनाई है।
हाल ही में, कोवेंट्री यूनिवर्सिटी में पढ़ने आए भारतीय छात्र नगप्पन को स्पेशल टीम ने एक स्टोर पर तय अवधि से ज्यादा काम करते हुए पकड़ा था। इससे पहले पिछले साल भी वेस्ट मिडलैंड्स में 12 भारतीयों को एक फैक्ट्री में अवैध रूप से काम करते हुए गिरफ्तार किया गया था।
एजेंसियों को ब्रिटेन में स्टूडेंट वीज़ा के नाम पर ट्रैफिकिंग (मानव तस्करी) के कुछ मामलों का भी पता चला है। एजेंटों के मार्फत यहां आने वाले कई लोग कुछ महीने बाद ही पढ़ाई छोड़ देते हैं और अवैध रूप से वर्क प्लेस पर फुल टाइम काम शुरू कर देते हैं। ये लोग दक्षिण लंदन और मैनचेस्टर जैसे इलाकों में एजेंसियों से बचने के लिए कैश में पेमेंट लेते हैं। इससे वर्क प्लेस मालिकों को भी फायदा होता है, क्योंकि वे इन लोगों को न्यूनतम मजदूरी (लगभग 10 पाउंड प्रति घंटा) से भी कम भुगतान करते हैं।
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big screw on Indian students in UK




