चंडीगढ़: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने भारतीय सेना के एक पूर्व जवान की विधवा को चार दशक से अधिक लंबे इंतजार के बाद बड़ा कानूनी इंसाफ दिया है। अदालत ने स्पष्ट फैसला सुनाते हुए कहा कि महज सात साल की सेवा के बाद अमान्य (इनवैलिडेट) घोषित कर सेना से बाहर किए गए जवान की विधवा को पेंशन के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार की उस दलील को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें 10 साल की न्यूनतम अर्हकारी सेवा (क्वालीफाइंग सर्विस) पूरी न होने और 42 साल की अत्यधिक देरी का हवाला देकर दावे का विरोध किया गया था।
1971 में भर्ती हुआ था जवान, 1978 में किया गया था अमान्य
यह मामला पंजाब के होशियारपुर की रहने वाली एक बुजुर्ग विधवा से जुड़ा है, जिनके पति 18 अगस्त 1971 को भारतीय सेना में भर्ती हुए थे। वर्ष 1978 में चिकित्सीय रूप से अमान्य पाए जाने पर उन्हें लगभग सात साल की सेवा के बाद सेना से सेवामुक्त कर दिया गया था। उस समय सेना की ओर से उन्हें अमान्य ग्रेच्युटी और मृत्यु-सह-सेवानिवृत्ति ग्रेच्युटी का भुगतान तो कर दिया गया, लेकिन नियमित अमान्य पेंशन (इनवैलिडिंग पेंशन) का लाभ नहीं दिया गया। वर्षों बाद विधवा ने अपने पति के इस कानूनी हक को पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया।
केंद्र सरकार की आपत्तियां हाईकोर्ट में खारिज
अदालत में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने याचिका का कड़ा विरोध किया। सरकार की ओर से दलील दी गई कि नियमानुसार पेंशन पाने के लिए कम से कम 10 वर्ष की अर्हकारी सेवा अनिवार्य होती है, जिसे संबंधित सैनिक ने पूरा नहीं किया था। इसके अलावा, सरकार ने यह तकनीकी आपत्ति भी उठाई कि घटना के करीब 42 साल बीत जाने के बाद इतना पुराना दावा कानूनी रूप से स्वीकार करने योग्य नहीं है।
स्थापित न्यायिक सिद्धांतों को हाईकोर्ट ने दी प्राथमिकता
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद ऐतिहासिक व्यवस्था दी कि कानून की स्थापित स्थिति के अनुसार ‘अमान्य पेंशन’ के मामलों में 10 साल की सेवा पूरी होना कोई अनिवार्य और अड़चन पैदा करने वाली शर्त नहीं है। अदालत ने रेखांकित किया कि पेंशन एक निरंतर मिलने वाला अधिकार है और इसे केवल प्रक्रियात्मक देरी के आधार पर पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता। अदालत ने तकनीकी आपत्तियों को दरकिनार करते हुए पेंशन नियमों और पूर्व स्थापित न्यायिक मिसालों को सर्वोपरि माना और विधवा को पेंशन लाभ देने का मार्ग पूरी तरह साफ कर दिया।


Widow of soldier dismissed from the Army after 7 years gets justice after 42 years




