चंडीगढ़: पंजाब की आबोहवा में घुलते जहर को लेकर एक बेहद चौंकाने वाली और आंखें खोल देने वाली रिसर्च सामने आई है। राज्य में दौड़ने वाले कुल वाहनों में से भले ही अत्यधिक धुआं छोड़ने वाले ‘सुपर-एमिटर्स’ (Super-emitters) की तादाद 11 से 28 प्रतिशत ही है, लेकिन ये मुट्ठी भर गाड़ियां पंजाब के कुल परिवहन प्रदूषण में 70 प्रतिशत से अधिक की जहरीली हिस्सेदारी रखती हैं। सेंटर फॉर स्टडी ऑफ साइंस, टेक्नोलॉजी एंड पॉलिसी (CSTEP) द्वारा इंडिया क्लीन एयर समिट (ICAS) 2026 में जारी की गई रिपोर्ट ने राज्य में पर्यावरण सुरक्षा की पोल खोलकर रख दी है।
3 लाख गाड़ियां कबाड़ बनने की कगार पर, स्क्रैपिंग सेंटरों की भारी किल्लत
थिंक टैंक CSTEP की ‘पाथवेज फॉर क्लीन ट्रांसपोर्टेशन इन पंजाब’ नामक इस स्टडी में खुलासा हुआ है कि राज्य में करीब 3 लाख ऐसे पुराने वाहन मौजूद हैं, जो सीधे तौर पर स्क्रैपिंग (कबाड़ में जाने) की श्रेणी में आते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, इतने बड़े पैमाने पर पुराने वाहनों को नष्ट करने के लिए पंजाब को कम से कम 15 रजिस्टर्ड व्हीकल स्क्रैपिंग फैसिलिटी (RVSF) की जरूरत है। वर्तमान में राज्य में सिर्फ 5 ऐसे सेंटर संचालित हो रहे हैं। बाकी के 10 नए स्क्रैपिंग सेंटर स्थापित करने के लिए सरकार को करीब 140 करोड़ रुपये के भारी-भरकम निवेश की दरकार होगी।
1.6% भारी वाहन उगल रहे 2,102 टन जहरीला धुआं (PM2.5)
स्टडी के आंकड़े बेहद डराने वाले हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भारी व्यावसायिक वाहन (HCVs) राज्य के कुल वाहनों का महज 1.6 प्रतिशत हिस्सा हैं, लेकिन वे हर साल 2,102 टन घातक PM2.5 कण हवा में छोड़ रहे हैं। इसकी तुलना में पंजाब की सड़कों पर सबसे ज्यादा दिखने वाले दोपहिया वाहन सिर्फ 228 टन प्रति वर्ष PM2.5 उत्सर्जित करते हैं। CSTEP में एयर क्वालिटी पॉलिसी की प्रमुख स्वागता डे ने जोर देकर कहा कि भले ही पंजाब ने ई-रिक्शा और पैसेंजर वाहनों के इलेक्ट्रिफिकेशन में अच्छी बढ़त बनाई हो, लेकिन पुराने भारी कमर्शियल वाहनों और सुपर-एमिटर्स पर नकेल कसे बिना प्रदूषण को हराना नामुमकिन है।
6 जिलों के सर्वे में खुली पोल, 89% वाहन स्थानीय स्तर पर रजिस्टर्ड
यह चौंकाने वाला अध्ययन पटियाला, लुधियाना, अमृतसर, जालंधर, मोगा और होशियारपुर में किए गए विस्तृत सर्वे के आधार पर तैयार किया गया है। जांच में पाया गया कि सड़कों पर दौड़ने वाले 89 प्रतिशत वाहन पंजाब में ही रजिस्टर्ड हैं और इनमें से कई 10 से 15 साल पुराने तीन-पहिया व व्यावसायिक वाहन बेधड़क चल रहे हैं। चूंकि ज्यादातर गाड़ियां स्थानीय हैं और एक जिले से दूसरे जिले में आवाजाही करती हैं, इसलिए विशेषज्ञों ने राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के तहत सिर्फ शहर-केंद्रित रणनीति के बजाय पूरे राज्य के स्तर पर सख्त उम्र सीमा (एज-बेस्ड रिटायरमेंट), लो-एमिशन जोन और बीएस-4 भारी वाहनों के रेट्रोफिटिंग जैसे कड़े कदम उठाने की जोरदार सिफारिश की है।


In Punjab, just 28% of vehicles are responsible for 70% of toxic emissions, with 3 lakh vehicles




