You are currently viewing पंजाब के शहरों में खतरे में बच्चों का भविष्य, हर चौथा बच्चा कुपोषण का शिकार; हैरान कर देगी सरकार की ये रिपोर्ट

पंजाब के शहरों में खतरे में बच्चों का भविष्य, हर चौथा बच्चा कुपोषण का शिकार; हैरान कर देगी सरकार की ये रिपोर्ट

चंडीगढ़: पंजाब में बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर एक बेहद चिंताजनक और चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। प्रदेश के शहरों में हर चौथा बच्चा कुपोषण का शिकार है। हैरानी की बात यह है कि ग्रामीण इलाकों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में कुपोषण की स्थिति कहीं ज्यादा गंभीर है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की हालिया रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि भले ही कुपोषण के आंकड़ों में पहले के मुकाबले थोड़ी कमी आई हो, लेकिन यह आज भी पंजाब के लिए एक विकराल समस्या बनी हुई है।

शहरों में गांवों से भी ज्यादा खराब हैं हालात

स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में पांच साल तक के 23 फीसदी बच्चों की लंबाई उनकी उम्र के हिसाब से नहीं बढ़ रही है, जबकि ग्रामीण इलाकों में यह आंकड़ा 18.9 फीसदी है। हालांकि साल 2020-21 के दौरान यह आंकड़ा 24.5 फीसदी था, जो 2023-24 में घटकर 20.4 फीसदी हो गया है, लेकिन शहरों में हालात अभी भी चिंताजनक बने हुए हैं। इसके अलावा 23.7 प्रतिशत शहरी और 23.6 प्रतिशत ग्रामीण बच्चों का वजन उम्र के हिसाब से कम है। वहीं, शहरों में 17.2 फीसदी बच्चों में लंबाई के साथ वजन न बढ़ने की समस्या भी देखी जा रही है। करीब 4 फीसदी बच्चों में यह समस्या बेहद गंभीर स्तर पर है, जिससे उनमें अन्य बीमारियों का खतरा काफी बढ़ जाता है। अधिक वजन यानी मोटापे की समस्या ग्रामीण इलाकों (1.5%) के मुकाबले शहरों (2.3%) में थोड़ी ज्यादा है।

आंगनबाड़ी केंद्रों पर स्टाफ की भारी कमी और पोषण योजनाएं

कुपोषण से निपटने के लिए पंजाब के 23 जिलों में कुल 27,313 आंगनबाड़ी केंद्र स्थापित किए गए हैं, जिनके जरिए 155 विभिन्न परियोजनाएं चलाई जा रही हैं। इन केंद्रों पर गर्भवती महिलाओं और बच्चों में पोषक तत्वों की कमी पूरी करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार मिलकर कई विशेष अभियान चला रही हैं। सामाजिक सुरक्षा, महिला और बाल विकास विभाग द्वारा बच्चों को नमकीन दलिया, मीठा दलिया, मुरमुरे और खिचड़ी बांटी जाती है, जबकि महिलाओं को पंजीरी दी जाती है। इन सब प्रयासों के बावजूद प्रदेश में आंगनबाड़ी वर्करों और हेल्परों की भारी कमी एक बड़ा रोड़ा बनी हुई है। वर्तमान में 25,663 वर्कर काम कर रहे हैं, लेकिन स्टाफ की कमी के चलते बच्चों को इन केंद्रों से जोड़ने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

आखिर क्यों रुक रहा है बच्चों का विकास और क्या हैं तय मानक

विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों का विकास रुकने के कई अहम कारण हैं। सबसे बड़ा कारण बच्चों को पर्याप्त मात्रा में ऊर्जा, प्रोटीन और अन्य जरूरी पोषक तत्वों का न मिलना है। भोजन में अलग-अलग खाद्य पदार्थों का अभाव भी शरीर में पोषक तत्वों का संतुलन बिगाड़ देता है। इसके अतिरिक्त हृदय रोग, किडनी रोग या अन्य पुरानी बीमारियों के कारण भी बच्चों के शरीर में कैलोरी की मांग बढ़ जाती है, जिससे उनका सही से विकास नहीं हो पाता। स्वास्थ्य मानकों के मुताबिक बच्चों की लंबाई और वजन उनकी उम्र, लिंग और अनुवांशिकता पर निर्भर करता है। एक नवजात की औसत लंबाई 18-22 इंच और पांच वर्ष तक 39-43 इंच होनी चाहिए। वजन के मामले में एक साल के लड़के का वजन 9.6 किलो और लड़की का 8.9 किलो होना चाहिए, जो पांच साल की उम्र तक क्रमशः 18.3 किलो और 18.2 किलो तक पहुंच जाना चाहिए।

The future of children in Punjab’s cities is at risk, with one in four children suffering from malnutrition