रोपड़: पंजाब की जीवनरेखा मानी जाने वाली सतलुज और इसकी सहायक सिरसा नदी में हिमाचल प्रदेश के औद्योगिक क्षेत्रों से खतरनाक केमिकल युक्त कचरा बहाया जा रहा है। इस गंभीर जल प्रदूषण और लोगों की जान से हो रहे खिलवाड़ के खिलाफ आम आदमी पार्टी (आप) के विधायक दिनेश चड्ढा की शिकायत पर रोपड़ सिटी थाने में एक बड़ी एफआईआर दर्ज की गई है। इस खुलासे के बाद से पंजाब में हड़कंप मच गया है, क्योंकि यह जहरीला पानी न सिर्फ जलीय जीवों बल्कि रोपड़ शहर के निवासियों के पीने के पानी और सेहत के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बन चुका है।
अज्ञात औद्योगिक इकाइयों पर कसा कानूनी शिकंजा
विधायक दिनेश चड्ढा की शिकायत के आधार पर पुलिस ने हिमाचल प्रदेश के बद्दी-नालागढ़ औद्योगिक क्षेत्र की अज्ञात फैक्ट्रियों के खिलाफ कड़ा कानूनी एक्शन लिया है। पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) 2023 की धारा 270, 271, 279 और 280 के साथ-साथ जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की सख्त धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है। विधायक चड्ढा का आरोप है कि रोपड़ हेडवर्क्स के पास भारी मात्रा में रासायनिक कचरा जमा हो गया है, जिसका सीधा स्रोत बद्दी और नालागढ़ की फैक्टरियां हैं।
पर्यावरणविद की पंजाब सीएम से अपील, बॉर्डर पर लगें सेंसर
नदियों में घुल रहे इस जहर को लेकर जाने-माने पर्यावरणविद कर्नल (रिटायर्ड) जसजीत सिंह गिल ने भी मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान को पत्र लिखकर मांग की है कि वह तुरंत हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री के साथ इस मुद्दे पर बैठक करें। गिल ने चेताया है कि फार्मास्युटिकल और इथेनॉल प्लांट का प्रदूषित पानी सिरसा नदी के जरिए घनौली के पास पंजाब में प्रवेश कर रहा है, जिससे राज्य की नहरों और नदियों का पानी पूरी तरह प्रदूषित हो रहा है। उन्होंने पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीपीसीबी) से मांग की है कि हिमाचल से पंजाब में प्रवेश करने वाली नदियों के एंट्री पॉइंट (विशेषकर घनौली) पर रियल-टाइम वाटर पॉल्यूशन मॉनिटरिंग सेंसर लगाए जाएं ताकि इस जहर को तुरंत मापा जा सके।
वैज्ञानिक शोध में रोंगटे खड़े करने वाले खुलासे, पानी में मिला पारा और सीसा
सतलुज की प्रमुख सहायक नदी सिरसा अब उत्तर भारत की सबसे प्रदूषित जल संरचनाओं में तब्दील हो चुकी है। साल 2024 में आरोही दीक्षित और उनके साथियों द्वारा किए गए एक वैज्ञानिक शोध में बेहद चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। अध्ययन के अनुसार, नदी के पानी में सिप्रोफ्लोक्सासिन और सेटीरिज़िन जैसे फार्मास्युटिकल यौगिक खतरनाक स्तर (50 से 150 माइक्रोग्राम प्रति लीटर) पर मौजूद हैं। यह केमिकल पानी में लगातार मिलने से एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) को बढ़ावा दे रहा है।
इसके अलावा एसके भारद्वाज और उनकी टीम द्वारा किए गए एक अन्य शोध में नदी के पानी में पारा, क्रोमियम, कैडमियम, थैलियम और लेड (सीसा) जैसी जानलेवा भारी धातुओं की मौजूदगी भी पाई गई है। धातु प्रसंस्करण और डाईंग यूनिट्स से निकलने वाले ये केमिकल नष्ट नहीं होते और सीधे खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर रहे हैं। इन तमाम वैज्ञानिक रिपोर्टों ने साबित कर दिया है कि बद्दी से निकलने वाला औद्योगिक कचरा पंजाब की आबोहवा के लिए एक साइलेंट किलर बन चुका है।


Major action taken for discharging chemical waste into the Sutlej and Sirsa rivers; FIRs registered against factories in Baddi




