सड़कों पर घूम रही LIVE मौत. खतरे में बच्चों की जान – पैरेंट्स अंजान. पुलिस बेख़ौफ़- स्कूल प्रशासन मौन आखिर बच्चों की मौत का जिम्मेदार कौन. देखें ये तस्वीरें और बचा लें अपने बच्चें





जालंधर : जिस बच्चे को आप घर से तैयार करके ऑटो से स्कूल भेजते हैं और ऑटो से ही उसके आने का इंतजार करते हैं वो बच्चा ऑटो में कैसा सफर करता है क्या कभी आपने खुद उस सफर को देखा। बेशक कभी आपने देखा हो या न हो लेकिन आज हमारे शहर के कुछ मीडिया कर्मियों ने जो देखा वो इन तस्वीरों के माध्यम से आपके सामने पेश है। मकसूदां से लेकर जालंधर कैंट तक के कई स्कूलों की ऐसी तस्वीरें हमने खींचीं जो साफ तौर पर दर्शाती हैं कि बच्चों को जानवरों की तरह आटो में ठूंसा जाता है। कुछ तस्वीरें तो ऐसी हैं जिन्हें देखकर लगता ही नहीं कि ये किसी अच्छे स्कूल के लिए लगाई गई उपयुक्त परिवहन सेवा है, ऐसे लगा मानो फोकल प्वाइंट में किसी फैक्ट्री के स्क्रैप की भांति बच्चों को ले जाया जा रहा है। वैसे ऐसे हालात में हादसों की आशंका भी बनी रहती है।

हाल ही में नीटू शटरांवाला की बच्ची साक्षी की मौत भी कुछ ऐसे ही हालातों में हुई है।  ट्रैफिक विभाग की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह ऐसे ऑटो चालकों को रोके ताकि मासूम बच्चों की जिंदगीयों को हादसों से बचाया जा सके , वही इन बच्चों के अभिभावकों की भी जिम्मेदारी बनती है कि वह भी अपने बच्चों को ऐसे खुले ऑटो जिसमें बच्चे तह नियम के ज्यादा भरे जा रहे हो ऐसे ऑटो या रिक्शा में न भेजें।

अभिभावक क्या करें

हम इस अव्यवस्था को लेकर किसी पर दोष नहीं मढ़ रहे बल्कि अभिभावकों को सचेत कर रहे हैं कि अगर वो ऑटो में अपने बच्चे को स्कूल भेजते हैं तो ऑटोवाले से पूरी बात कर लें कि अगर बच्चों की संख्या अधिक हुई तो हम ऑटो बदल देंगे। अगर फिर भी हालात न सुधरें तो पहले स्कूल मैनेजमेंट और फिर पुलिस से बात करें। साथ ही बच्चों को भी कहें कि वे ऑटोवाले से जिद्द करके आगे बैठने और साइड में न बैठें क्योंंकि सड़क पर हादसे का डर बना रहता है।

गेड़े दा सवाल, बच्चेयां दा बुरा हाल

कई बार ऑटो वाले अच्छे गेड़े (दिहाडी) के लालच में अधिक बच्चों को ऑटो में बिठा लेते हैं। हमारी अपील है कि आप इस मानसिकता को त्याग दें। अगर ऐसे हालात बनते हैं तो छोटे बच्चों की सुरक्षा के मद्देनजर सीट बेल्ट, सीट के साथ लगने वाला बैरिकेड अवश्य लगाएं ताकि एकदम ब्रेक लगाने से बच्चे गिरे नहीं।

स्कूल प्रशासन की जिम्मेदारी

बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था की स्कूल प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है । कई स्कूल ये कह कर पल्ला झाड़ लेते है कि अभिवावकों ने खुद की मर्जी से अपने बच्चों के लिए ऑटो लगवाए हुए है इस मे स्कूल प्रशासन का कोई रोल नही है। भले ही रोल नही है मगर ऑटो वाले बच्चों को लेने व छोड़ने तो स्कूल में ही आते है। बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था के लिए ट्रेफिक पुलिस के माध्यम से बच्चों अभिवावकों और ऑटो ड्राइवरो को तो नियमों के प्रति जागरूक किया जा सकता है।

 

कब जागेगी ट्रैफिक पुलिस 

ऐसे हादसों की सब से बड़ी वजह ट्रैफिक पुलिस की ढीली कारगुजारी है। अगर ट्रैफिक पुलिस सख्ती से पेश आये खासकर स्कूलों के बाहर वह ट्रेफिक पुलिस कर्मी तैनात कर चेकिंग अभियान चलाए तो इस मुसीबत का हल किया जा सकता है। और अगर नियमो को सख्ती पहले से लागू करवाया गया होता तो आज नीटू की बेटी साक्षी जीवित होती

 

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